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फ़रवरी, 2020 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

दर्द दिल्ली का

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दिल्ली के हालात पर मेरे दुःखी मन से निकली हुई कुछ पंक्तियां🤔😔 किसने भीड़ को भड़काया, किसने इतनी नफ़रत फैलाई। लहू से लथपथ हुई दिल्ली, किसने दिलों में आग लगाई। दिल्ली का दर्द क्या दिलेर?क्या बुजदिल? यहां हर दिल जला है। भीड़ को भड़काने वाले,नादान! यह दिल्ली नहीं, देश का दिल जला है। किसके बिगड़े बोलो ने, दिशाहीन भीड़ को उकसाया। किसके नफरती इरादों ने, खूनी होली का खेल रचाया। बेकसूर बेमौत मारे गए। असली कातिल कहां जला हैं। यह दिल्ली नहीं, देश का दिल जला हैं। किसी ने भाई, किसी ने बेटा खोया। किसी का स्वाग उजड़ा है। मरने वाले सब अपने ही थे, अपनों का ही घर,संसार उजड़ा है। छोड़ो ये रंजिशे, प्यार का पैग़ाम दो, नफरतों से अबतक किसको क्या मिला है। यह दिल्ली नहीं, देश का दिल जला है। बबलेश कुमार✍🙏🏻🙏🏻

जमीर जिंदा रख

बाग ए बहार बर्बाद ना हो जाए बोलने का जज़्बा जिंदा रख गर तू जिंदा है तो जमीर को भी जिंदा रख। जहां घना है रात सा अंधेरा उठा के वहां अब चांद को रख दिनभर चली जहां बाते नफ़रत की तमाम उसी जगह तू बात मोहब्बत की शाम को रख।

मानने के लिए वेलेंटाइन डे आज

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मानने के लिए वेलेंटाइन डे आज मानने के लिए वेलेंटाइन डे आज लो उसी जगह हम फ़िर आए बैठे हैं। तेरे दीदार से बुझती थी जहां मेरी तड़फ की आग आज हम उसी बाग में अकेले आए बैठे हैं। पूछते हो हमसे! क्या क्या याद है तुम्हे? दो घड़ी बैठो तो सही हम तो यादों का अंबार लगाए बैठे हैं। जो मुश्किल से मिलते थे महीनों बाद उनसे हम आज भी उम्मीदें हजार लगाए बैठे हैं। जिस पेड़ पर लिखें थे दोनों ने एक दूजे के नाम हम उसी से आज अकेले सर लगाए बैठे हैं। वेलेंटाइन डे वेलेंटाइन तो एक बहाना है दस्तूर-ए-मोहब्बत का उम्मीद-ए-दीदार तुझसे हर रोज़ लगाए बैठे हैं। समंदर सा गहरा है इश्क़ उसका इसमें हैरत नहीं, डूबने के जिद में ही तो किनारे पे आशियाना बनाए बैठे हैं।

रविदास जयंती विशेष

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समानता एवं लोक कल्याणकारी राज्य व्यवस्था के प्रतिपादक - संत शिरोमणि रविदास भारतीय संत परम्परा के संतो में प्रसिद्ध संत श्री गुरु रविदास एक महान संत हुए हैं। जिन्होंने ज्ञान और भक्ति का प्रसार तो किया ही साथ ही समाज में फैली बुराइयों पर भी अपनी प्रेममय वाणी से प्रहार भी किया। उनकी वाणी में आक्रोश नहीं बल्कि सर्वत्र प्रेम ही दिखाई देता है। उनका संदेश था कि सभी मनुष्य प्रेम व भाईचारे को अपनाए तथा सबके साथ समानता का व्यवहार करे। व्यक्ति अपने कर्म से पतित होता है, जन्म से कोई छोटा बड़ा नहीं होता। सबमें वहीं ईश्वर अंश समाया हुआ है।  उसी का ध्यान करते हुए पूर्ण मनोयोग से ईमानदारी के साथ श्रमशील होकर कर्म करे। रविदास एक ऐसे दृष्टा गुरु व समाज सुधारक थे जिन्होंने अपने समय में ही आज के लोक कल्याणकारी राज्य का स्वप्न देख लिया था जो आज भारतीय संविधान का मुख्य ध्येय है। उनकी इस धारणा का दर्शन हमें उनके इस दोहे में मिलता है- ऐसा चाहू राज में,सबन को मिले अन्न। छोटे बड़े सब सम बसे,रैदास रहे प्रसन्न। संत शिरोमणि रविदास इन पंक्तियों में रविदास जी ने समानता एवं लोक कल्याणकारी शासन व...

मौसम बदल रहा है

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मौसम बदल रहा है Mosam badal raha hai  मोहब्बत की महक थी चमन में अमन-ए-मौसम बदल रहा है। उड़ते प्रेम के परिंदे को अब नफ़रत का नाग निगल रहा है। कोई सुनकर बेहरा हुआ, कोई देखकर अंधा है। अब किसको पूछे कि क्या हो रहा है। लहूलुहान हुआ क्यू मुल्क मेरा लाचार लोकतंत्र रो रहा है। कल तक जो सच बेखौफ बोल रहा था क्या हुआ ऐसा जो आज बयान बदल रहा है। एक हाथ में झंडा,एक में डंडा लिए वो जिधर चल रहा है। उसे कौन समझाए कि वो किधर चल रहा है। रंग -ए-मजहब के नाम पर लहू बहाने वाले  जरा पहचान के बता  ये सड़क पे किस मजहब का खून बह रहा है। यह खामोशी तेरी लाज़मी नहीं जवाब दे, अब क्यू छुपा के नज़रे खामोश निकल रहा है। बबलेश कुमार✍