रविवार, 9 फ़रवरी 2020

रविदास जयंती विशेष


समानता एवं लोक कल्याणकारी राज्य व्यवस्था के प्रतिपादक - संत शिरोमणि रविदास


भारतीय संत परम्परा के संतो में प्रसिद्ध संत श्री गुरु रविदास एक महान संत हुए हैं। जिन्होंने ज्ञान और भक्ति का प्रसार तो किया ही साथ ही समाज में फैली बुराइयों पर भी अपनी प्रेममय वाणी से प्रहार भी किया। उनकी वाणी में आक्रोश नहीं बल्कि सर्वत्र प्रेम ही दिखाई देता है।
उनका संदेश था कि सभी मनुष्य प्रेम व भाईचारे को अपनाए तथा सबके साथ समानता का व्यवहार करे।
व्यक्ति अपने कर्म से पतित होता है, जन्म से कोई छोटा बड़ा नहीं होता। सबमें वहीं ईश्वर अंश समाया हुआ है।
 उसी का ध्यान करते हुए पूर्ण मनोयोग से ईमानदारी के साथ श्रमशील होकर कर्म करे। रविदास एक ऐसे दृष्टा गुरु व समाज सुधारक थे जिन्होंने अपने समय में ही आज के लोक कल्याणकारी राज्य का स्वप्न देख लिया था जो आज भारतीय संविधान का मुख्य ध्येय है।
उनकी इस धारणा का दर्शन हमें उनके इस दोहे में मिलता है-

ऐसा चाहू राज में,सबन को मिले अन्न।
छोटे बड़े सब सम बसे,रैदास रहे प्रसन्न।

संत शिरोमणि रविदास

इन पंक्तियों में रविदास जी ने समानता एवं लोक कल्याणकारी शासन व्यवस्था का उल्लेख किया है रविदास जी ने ऐसी लोक कल्याणकारी शासन व्यवस्था की कल्पना की थी जो समानता प्रेम और बंधुत्व पर आधारित हो और भारतीय संविधान में भी इन लोकतांत्रिक मानवीय मूल्यों को प्रमुखता से अपनाया गया है।
रविदास एक ऐसे अनूठे संत थे जिन्होंने समाज में व्याप्त ऊंच-नीच भेदभाव छुआछूत आदि जातीय आधारित बुराइयों का प्रेम के साथ खुलकर विरोध किया।
जाति व्यवस्था को मानवता,प्रेम व भाईचारे की प्रबल शत्रु बताया है यह उनके उक्त दोहे से भी स्पष्ट होता है-

जात जात में जात है,जो केतन के पात।
रैदास मनुष ना जुड़, सके जब तक जात न जात।।

इसी बात को उनकी अगली पंक्तियां अच्छे से व्यक्त करती है-

जात जात के फेर में,उलझ रहे सब लोग।
मनुष्यता को खा रहा,रैदास जात का रोग।।

उनकी प्रेममय वाणी और ज्ञान से बड़े-बड़े लोग प्रभावित होकर उनके अनुयाई बने जिनमें चित्तौड़ के राजा व उनकी रानी और मीरा आदि प्रमुख थे। मीरा ने रैदास को अपना गुरु बनाया। यह उस समय की बहुत बड़ी परिवर्तनकारी घटना थी।
रविदास जी को झुकाने के सिकंदर लोदी के सभी प्रयास विफल हो गए और अंततः लोदी भी उनकी विद्वता से बड़ा प्रभावित हुआ।
इसी विद्वता से प्रभावित होकर काशी के पंडितों ने उन्हें संत शिरोमणि की उपाधि दी। उनके अनुयाई प्रतिवर्ष रविदास जयंती पूरे भारत में बड़ी धूमधाम से मनाते हैं जिनमें पंजाब और हरियाणा के श्रद्धालु विशेष आकर्षण पैदा करते हैं। पालकी में बिठाकर अपने गुरु की कलश यात्रा निकालते है और जगह जगह लंगर चलाया जाता हैं।
इनकी वाणी के 40 पद गुरुग्रंथ साहिब में भी मिलते है।
रविदास जी के अनुयाई भारत ही नहीं ब्रिटेन कनाडा आदि कई अन्य देशों में भी निवास करते हैं और प्रत्येक वर्ष माघ पूर्णिमा को रविदास जयंती पर इनकी जन्मस्थली वाराणसी (उत्तर प्रदेश) जिसे इनके भक्त बेगमपुरा के नाम से संबोधित करते हैं, यहां आते हैं। यहां विशाल रविदास मंदिर बना हुआ है जिसमें 130 किलो सोने की पालकी,35 किलो सोने का दीपक और 32 स्वर्ण कलश मुख्य आकर्षण हैं।

गुरुजी की प्रसिद्धि का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि पिछले वर्ष रविदास जयंती पर श्रद्धालुओं ने जालंधर से वाराणसी तक पूरी ट्रेन ही बुक कर ली थी।हर वर्ष रविदास जन्मोत्सव पर देश-विदेश से लाखों की तादाद में श्रद्धालु बेगमपुरा आते हैं ऐसे महान संत की जन्मस्थली पर आकर सभी लोग धार्मिक और आत्मिक लाभ लेकर धन्यभागी होते हैं तथा मानवता प्रेम भाईचारे का संदेश लेकर जाते हैं।
जो लोग संतों को भी जाति,धर्म विशेष में बांटते हैं उन्हें स्वयं को समझाना होगा कि संत का संबंध किसी धर्म जाति संप्रदाय या देश से नहीं होता वह पूरी दुनिया और मानवता के लिए आदर्श होते हैं वह साक्षात सत्य स्वरूप होते हैं और सत्य को कभी किसी सरहद फिर लकीरों में नहीं बांटा जा सकता।

सबका कल्याण हो।
जय गुरु रविदास


बबलेश कुमार

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