ज़िंदगी है ज़िंदगी: आहिस्ता-आहिस्ता गुजरता एक हसीन सफर
नमस्ते दोस्तों!
अक्सर हम जीवन की भागदौड़ में इतने व्यस्त हो जाते हैं कि यह भूल जाते हैं कि हर बीतता पल एक नई कहानी लिख रहा है। ज़िंदगी कभी सवरती है, कभी बिखरती है, लेकिन रुकती कभी नहीं। आज मैं आपके साथ अपनी एक ऐसी ही कविता साझा कर रहा हूँ, जो जीवन के इन खट्टे-मीठे अनुभवों को शब्दों में पिरोने का एक छोटा सा प्रयास है।
कविता: ज़िंदगी है ज़िंदगी
जिंदगी है जिंदगी,
आहिस्ता आहिस्ता
गुजर जाती हैं।
कभी सवर जाती है
कभी बिखर जाती हैं।
कभी धुंधली होती हैं बहुत
तो कभी निखर जाती हैं।
कुछ यादें बनती हैं हसीन
कुछ दर्द भरी रह जाती हैं।
कुछ उम्रभर साथ चलती है
कुछ पीछे
छूट जाती है।
यह जिंदगी है जिंदगी,
आहिस्ता आहिस्ता
गुजर जाती हैं।
सुख दुख की कश्मकश में
भागती है बहुत तेज़
फिर भी वक्त से
पीछे रह जाती हैं।
यह वो कहानी है
जिसका पूर्व निर्धारित
कोई अंत नहीं।
जी भर के जी लो
फिर भी ख्वाहिश
अधूरी रह जाती हैं।
इंसान चले जाते है
बस यादें रह जाती है।
यह जिंदगी है जिंदगी
आहिस्ता आहिस्ता
गुजर जाती हैं।
निष्कर्ष (Conclusion)
ज़िंदगी किसी कलाई की चूड़ी नहीं है जो एक बार टूटने पर बिखर जाए, बल्कि यह तो वह 'जिंदादिली' है जो हर गिरती हुई सांस को एक नई उम्मीद देती है। चाहे हालात कैसे भी हों, ज़िंदगी का कारवां चलता रहता है। बस ज़रूरी है कि हम इसे हर पल 'जी भर के' जिएं, क्योंकि अंत में केवल यादें ही शेष रह जाती हैं।
आशा है कि आपको मेरी यह कविता पसंद आई होगी। आपके जीवन में ज़िंदगी का कौन सा पड़ाव सबसे यादगार रहा? कमेंट्स में मेरे साथ साझा ज़रूर करें।
— लेखक: बबलेश कुमार (उदयपुर)




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